आप की कहानी प्रखर या मुकेश से तो नहीं मिलती?

प्रखर और मुकेश जुड़वाँ भाई हैं| प्रखर ने दो वर्ष पहले इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की और मुकेश ने एक साल पहले उसी कॉलेज से एमबीए किया, जहाँ से प्रखर ने इंजीनियरिंग की थी| मुकेश जब अंतिम सेमेस्टर में था तभी उसे नौकरी मिल गई थी| शुरूआती वेतन मिला 2.40 लाख सालाना, मतलब लगभग 20 हजार महीना|  वह खुश था| छह महीने बाद वह कन्फर्म हो गया और अब वेतन हो गया 3.60 लाख रुपए सालाना| उधर, प्रखर जब बीटेक अंतिम वर्ष का छात्र था तो उसे भी कैम्पस से पहली नौकरी 2.20 लाख की मिली| उसने छोड़ दिया| दूसरी 2.40 लाख की मिली| प्रखर ने ज्वाइन नहीं किया| वह तीसरी बेहतर नौकरी की तलाश में था लेकिन मिली नहीं| अब वह बीटेक की डिग्री लेकर बेरोजगार था|

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अपने सगे भाई से चिढ़ने लगा| मम्मी-पापा की बातें भी उसे ख़राब लगने लगीं| वह बात-बात में भड़क जाता| परिवार के लोग परेशान रहने लगे| अपना होनहार बच्चा देखते ही देखते डिप्रेशन का मरीज हो गया| काउंसिलिंग की गरज से यह परिवार मुझे मिला| मुझसे जो बन पड़ा मैंने किया| प्रखर से बात की और सुझाव दिया कि फिलवक्त इसे डॉक्टर की जरूरत है| परिवार के लोग उसे डॉक्टर के पास ले गए| उन्होंने सुझाव दिया कि दवाएं तो मैं दे रहा हूँ लेकिन इसका ध्यान आप लोगों को ज्यादा रखना होगा क्योंकि प्रखर का इलाज घर में ही है| यह नकारात्मक सोचने लगा है| भाई की तरक्की उसे पसंद नहीं है| अंदर ही अंदर वह बेचैन हो उठता है| ऐसे में जरुरी है कि उसे अकेले न छोड़ा जाए| उसके सामने नकारात्मक बातें न होने पायें| सब लोग इस बात का ध्यान रखने लगे| मुझे भी यह परिवार बराबर मिलता रहा| डेवेलपमेंट से वाकिफ कराता रहा| एक काउंसलर के रूप में मैं जो कर सकता था, किया| दवा और काउंसिलिंग का असर हुआ| धीरे-धीरे चीजें सामान्य होने लगीं| प्रखर एहसास करने लगा कि उससे कॉलेज में चूक हुई थी| अगर उसने भी मिली हुई नौकरी ज्वाइन कर ली होती तो आज दोनों भाई मिलकर मम्मी-पापा का सहारा बन रहे होते| सामने सजी हुई थाल का भोजन इनकार किया तो आज मुश्किलों का सामना कर रहे हैं| भाई का यह हाल मुकेश देख नहीं पा रहा था| वह हर हाल में भाई को नौकरी दिलवाना चाहता था| बीमारी से उबरने के बाद प्रखर ने मुकेश से अपनी गलती स्वीकार की और मौका तलाशने की बात कही| मुकेश ने अपने बैचमेट से बात की| वहां उसे 2.80 लाख रुपए सालाना की नौकरी मिल गई| लेकिन इस दौरान प्रखर के दो वर्ष ख़राब हो गए| अब इस परिवार में खुशियाँ हैं|

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लेकिन, यहाँ से बहुत कुछ सीखा जा सकता है| प्रखर और मुकेश तो बहाना हैं| मैं ऐसे अनेक युवक-युवतियों को जानता हूँ जो बीटेक में प्रवेश लेने के साथ ही मान लेते हैं कि बढ़िया वाली नौकरी पक्की हो गई| कई बार तो वे क्लास बंक करके हास्टल से गायब होने से भी परहेज नहीं करते| प्लेसमेंट के लिए जब कम्पनियाँ आती हैं तो उसे भी कई बार ये युवा गंभीरता से नहीं लेते| फॉर्म भरकर भूल जाना सामान्य बात है| पर, ऐसा होना नहीं चाहिए| मुझे लगता है कि इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट की पढाई करने वाले किसी नौजवान से देश को बड़ी उम्मीदें हैं| ज्यादा अच्छा हो कि पहले जो नौकरी मिल रही है, उसे पकड़ लें फिर बेहतर की तलाश करें| उस पर कोई रोक नहीं है| न ही कॉलेज रोकता है और न ही घर वाले| क्योंकि दोनों ही युवा का हित चाहते हैं| मैं तो ऐसे सभी नौजवानों से यही कहूँगा कि कॉलेज से मिलने वाली नौकरी को अपने हाथ में ले लें| दूसरी की तलाश जरुर करते रहें| मिल जाए तो उसे ज्वाइन कर लें|

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ध्यान रहे ज्यादातर मम्मी-पापा बड़ी मुश्किलों से फीस देते हैं| दिल्ली हो चाहे चेन्नई, आज भी 15-20 हजार रुपए में आपका खर्च चलता है| और इतना ही आपने जुटा लिया तो मम्मी-पापा खुश हो जाते हैं| जैसे-जैसे आपका तजुर्बा बढ़ता है, सेलरी भी बढ़ती रहती है| कंपनी बदलने की सूरत में कुछ पैसे आसानी से और मिल जाते हैं| कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता| काम करने का तरीका आपको बड़ा या छोटा बनाता है| देश के हर उस नौजवान से मेरा अनुरोध है जो कॉलेज में अंतिम वर्ष के छात्र हैं, वे सावधान रहें| हाथ में आ रहे अवसर को जाने न दें| इन्हें जोर से पकड़ लें| खुद पर गौरव करें| मम्मी-पापा, टीचर्स  और कॉलेज भी आपकी तरक्की से गौरवान्वित होते हैं|

-लेखक वरिष्ठ पत्रकार, करियर, पैरेंटिंग, चाइल्ड काउंसलर एवं भावी पीढ़ी के विकास पर केन्द्रित अभियान ‘बस थोड़ा सा’ के प्रमुख हैं|

2 Comments

  • User
    Abhinandan Kumar

    Thanks for the sharing this motivation inspiration story

  • User
    Dinesh Pathak

    Thank you very Much, dear Abhinandan Kumar. your kind words inspiring me. thank you very much again. keep in touch. all the very Best

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