अंग्रेजी कमजोर है तो रवि की डगर हो सकती है मददगार

कान्वेंट एजुकेटेड सनी और गाँव के सरकारी स्कूल से पढाई के बाद रवि का दाखिला दिल्ली के एक नामी इंजीनियरिंग कॉलेज में हुआ| क्लास का पहला दिन था| दोनों एक साथ बैठे| थोड़ी देर एक-दूसरे के बारे में जाना फिर प्रोफ़ेसर आ गए| क्लास ओवर हुई तो रवि ने कहा-सनी भाई आप बहुत अच्छे इंसान हैं| आप में बहुत संभावनाएं हैं| मैं आपसे बहुत कुछ सीखना चाहता हूँ| क्या आप सिखाएँगे? सनी ने हामी भरी| समय बीता और दोनों बहुत अच्छे दोस्त हो गए| हास्टल का कमरा भी दोनों को आसपास मिला| रवि के सामने सबसे पहली चुनौती अपनी अंग्रेजी ठीक करने की थी| वह हिंदी माध्यम से पढ़ाई करके दिल्ली पहुंचा था|

रवि की एक आदत बहुत अच्छी थी| वह किसी में कुछ भी अच्छाई देखता तो उसे सराहता जरुर था| धीरे-धीरे वह पूरी क्लास में लोकप्रिय हो गया| वह सबसे कुछ न कुछ सीखने की कोशिश करता और आभार जताना कतई नहीं भूलता था| सनी के सामने उसने प्रस्ताव रखा कि वह उसे अंग्रेजी बोलना सिखाए| सनी ने उससे कहा कि सबसे पहले वह अंग्रेजी के अखबार जोर-जोर से बोलकर पढ़ना शुरू करे| रवि ने अमल करना शुरू किया| एक महीने बाद रवि ने सनी से आगे का सुझाव माँगा| सनी ने कहा आओ, कैंटीन तक चलते हैं| लगभग एक किलोमीटर की दूरी तय करते समय सनी ने अंग्रेजी में ही बातचीत शुरू की और रवि से अंग्रेजी में ही जवाब देने को कहा-चाहे कुछ गलत भी हो लेकिन उसे कोशिश करते रहना है| सनी ने यह भी कहा कि उसकी इन गलतियों पर एक बार में ही बताएगा|

लौटते समय सनी ने उसे बधाई दी और कहा कि तुमने बहुत अच्छी रफ़्तार पकड़ी है| एक महीने में इस तरह का परिवर्तन कम ही दिखता है| रवि खुश तो हुआ लेकिन अपनी कमियाँ पूछना नहीं भूला| सनी ने कहा-तुमसे कोई बड़ी चूक नहीं हुई है| हाँ, ग्रामर में कुछ सुधार की जरूरत है| सनी ने कहा-मैं तुम्हें कुछ किताबें कल दूँगा| उसे पढ़ना फिर तुम्हारी यह समस्या भी दूर हो जाएगी| अगले दिन सनी ने छोटे भाई की एनसीआरटी की पांचवीं तक की अंग्रेजी ग्रामर की किताबें लाकर दी और कहा कि अगले एक महीने में इसे पूरा पढ़ ले| इस दौरान जब भी हम मिलेंगे, केवल और केवल अंग्रेजी में बातें करेंगे| रवि ने कहा-मैं निराश नहीं करूँगा| एक महीने बाद पूरी किताब चट करके मिलूँगा| देखते देखते रवि ने दूसरे साथियों के साथ भी अंग्रेजी में बातचीत शुरू कर दी| प्रोफेसर्स भी उसकी सीखने की ललक के कायल हो गए|

रोज शाम रवि-सनी एक घंटे अकेले घूमने लगे| इस दौरान वायदे के मुताबिक दोनों अंग्रेजी में ही बातें करते| अखबार की एक-दो खबरों को बोलकर पढ़ने के बाद रवि ने सम्पादकीय पेज का मुख्य आर्टिकल भी अपने अभ्यास में शामिल कर लिया| तीन महीने की मजबूत इच्छाशक्ति और लगन की वजह से रवि का मामला बन गया | अब अंग्रेजी उसके लिए हव्वा नहीं रही| भय उसके दिमाग से उतर गया था| सनी ने उसे छठीं, सातवीं, आठवीं की ग्रामर की किताबें भी लाकर दीं| उसे पढ़ते हुए रवि का भरोसा और बढ़ गया| अब उसका आत्मविश्वास बहुत मजबूत हो गया था| क्लास में आयोजित एक भाषण प्रतियोगिता में रवि ने भी हिस्सा लिया और पहला पुरस्कार जीतने में सफल रहा| उसने अपनी बात रखते समय कॉलेज में दाखिले के बाद अंग्रेजी से भय को दूर करने की कहानी और दोस्तों खास तौर से सनी की टिप्स का जिक्र किया|

 

उसने कहा कि उसके माता-पिता जी ने दिल्ली भेजते समय यही कहा था कि हर इंसान में कुछ न कुछ अच्छाई होती है| तुम्हें उसे पकड़ लेना है और बुराई की ओर देखते हुए उससे दूरी बना लेनी है| अगर जीवन में इस सूत्र को साथ लेकर चलोगे तो तुम्हें आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं पायेगा| दूसरी महत्वपूर्ण बात रवि की बहन ने बताई थी| वह यह कि जब भी किसी के ज्ञान सागर से कुछ बूँदें पाने की इच्छा हो तो उसकी सराहना जरुर करे और लेने के बाद शुक्रिया अदा करना न भूले| इसके बाद कोई भी ज्ञानवान नारी या पुरुष आपको मना नहीं करेगा|

प्रतियोगिता का विनर घोषित करते समय तीन प्रोफेसर्स ने रवि को अव्वल घोषित करने का महत्वपूर्ण कारण उसके सीखने की प्रवृत्ति और कमजोरियों की पहचान कर उसे दूर करने की कोशिशों को ही बताया| कहने का आशय यह है कि अगर हम तरक्की के रास्ते पर चलना चाहते हैं तो सीखने की ललक होना बहुत जरुरी है| समाज में, कॉलेज में जो कुछ भी अच्छा है, उससे सीखते हुए अपनी नाव को आगे बढाने का प्रयास हमें मजबूत बनाता है| जिस भी नौजवान में यह ललक कायम है उसे आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता है|

 

-लेखक वरिष्ठ पत्रकार, करियर, पैरेंटिंग, चाइल्ड काउंसलर एवं भावी पीढ़ी के विकास पर केन्द्रित अभियान ‘बस थोड़ा सा’ के प्रमुख हैं|